रविवार, 9 अप्रैल 2017

हर दिन गायब हो जाता है कि स्तंभेश्वर महादेव का यह अद्भुत मंदिर


शायद आपको सुनने में अचरज लगे, लेकिन एक मंदिर वाकई ऐसा है, जो दिन में दो बार कुछ पल के लिए गायब हो जाता है। और फिर अपने आप ही मूल रूप में आ जाता है। परमपिता शिव का यह मंदिर गुजरात के बड़ोदरा से 85 किलोमीटर दूर भरुच जिले की जम्बूसर तहसील में गाँव ‘कावी’ में स्थित है।

भोले बाबा का यह रूप ‘स्तंभेश्वर महादेव’ के रूप में जाना जाता है।

समुद्री ज्वार-भाटे के कारण ऐसा होता है

 समुद्री ज्वारभाटे के कारण यह शिवालय नियमित रूप से कुछ पलों के जलमग्न हो जाता है। असल में मंदिर खंभात की खाड़ी के तीरे स्थित है। ज्वार के समय समुद्र का पानी मंदिर के अंदर आता है और शिवलिंग का अभिषेक कर वापस लौट जाता है। यह घटना प्रतिदिन सुबह और शाम को घटित होती है।

ज्वार से कुछ मिनट पूर्व परिसर को करा दिया जाता है खाली

स्थानीय पुजारियों और श्रद्धालुओं के मुताबिक़ स्तंभेश्वर मंदिर में विराजमान भगवान नीलकंठेश्वर का जलाभिषेक करने के लिए स्वयं समुद्र देवता पधारते हैं। ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है। उस समय वहां किसी के भी प्रवेश की अनुमति नहीं है। यहां दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खासतौर से पर्चे बांटे जाते हैं, जिसमें ज्वार-भाटा आने का समय लिखा होता है, ताकि उस वक्त मंदिर में कोई प्रवेश न करे। मंदिर दिन में सुबह और शाम को पल भर के लिए ओझल हो जाता है और कुछ देर बाद उसी जगह पर वापस भी आ जाता है।

पुराणों में विस्तार से वर्णित है यह तीर्थ

वैसे तो इस तीर्थ को 200 वर्ष पहले ही खोजा गया है। परन्तु इस तीर्थ का उल्लेख ‘शिवपुराण’ में रुद्र संहिता के एकादश अध्याय में मिलता है। जो इस शिवधाम के अति-प्राचीन होने का प्रमाण है। स्कन्द पुराण में इस मंदिर के निर्माण के संबंध में काफी विस्तार से चर्चा की गयी है। कथा के अनुसार असुराधिपति ताड़कासुर ने अपनी कठोर तपस्या से भोले शिव को प्रसन्न कर लिया था। जब शिव उसके सामने प्रकट हुए तो उसने वरदान मांगा कि उसे कोई न मार सके, इस पर शिव ने कहा यह तो असंभव है। इस पर असुर ने वर मांगा की उसे सिर्फ शिव पुत्र ही मार सकता है और वह भी छह दिन की आयु का। त्रिकालज्ञ शिव ने उसे यह वरदान सहर्ष दे दिया। वरदान मिलते ही ताड़कासुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचाना शुरू कर दिया। देवतागण और बाकी ऋषि-मुनि आतंक से त्रस्त होकर अंतत: महादेव की शरण में पहुंचे।


अपराधबोध की भावना से कार्तिकेय ने कराया मंदिर का निर्माण

शिव-शक्ति से श्वेत पर्वत के कुंड में उत्पन्न हुए भगवान कार्तिकेय के जन्म से ही 6 मस्तिष्क, चार आंख एवं बारह हाथ थे। और महज 6 दिन की अवस्था में कार्तिकेय ने ताड़कासुर का वध कर दिया। वधोपरांत कार्तिकेय को ज्ञात हुआ कि ताड़कासुर उनके पिता भोलेनाथ का परम भक्त था। इससे उनका मन ग्लानि से भर उठा। तब जगत पालक विष्णु जी ने कार्तिकेय स्वामी से कहा कि आप वधस्थल पर शिवालय बनवायें, इससे ही आपका मन शांत हो सकेगा। कार्तिकेय स्वामी ने ऐसा ही किया। समस्त देवगणों ने एकत्र होकर महिसागर संगम तीर्थ पर ‘विश्वनंदक’ स्तंभ की स्थापना की। पश्चिम भाग में स्थापित स्तंभ में भगवान शंकर स्वयं आकर विराजमान हुए। तब से ही इस तीर्थ को स्तंभेश्वर कहते हैं। यहाँ पर महिसागर नदी का सागर से संगम होता है।

भक्ति और सौन्दर्य से परिपूर्ण है यह धाम

यहाँ शिवलिंग 4 फुट ऊंचा और दो फुट के व्यास वाला है। इस प्राचीन मंदिर के पीछे स्थित अरब सागर का सुंदर नजारा पर्यटकों के मन को मोह लेता है। स्तंभेश्वर महादेव में महाशिवरात्रि और हर अमावस्या पर मेला लगता है। प्रदोष, पूर्णमासी और एकादशी को पूरी रात यहाँ चारों प्रहर पूजा-अर्चना होती है। काफी दूर-दूर से श्रद्धालु ‘समुद्र’ द्वारा स्तंभेश्वर महादेव के जलाभिषेक का अद्भुत दृश्य देखने आते हैं। वातावरण में पवित्रता और रमणीयता का अलौकिक संगम नजर आता है।


मंगलवार, 28 मार्च 2017

चैत्र नवरात्र 2017 कलश स्थापना का महत्व और पूरी विधि

नवरात्र के आरंभ में प्रतिपदा तिथि को कलश या घट की स्थापना की जाती है

: नवरात्र में देवी पूजा के लिए जो कलश स्थापित किया जाता है वह सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का ही होना चाहिए।

महागुरु गौरव मित्तल। आज से मां दुर्गा के नवरात्र शुरु हो गए है। नवरात्र के आरंभ में प्रतिपदा तिथि को कलश या घट की स्थापना की जाती है। कलश को भगवान गणेश का रूप माना जाता है। हिन्दू धर्म में हर शुभ काम से पहले गणेश जी की पूजा का विधान है। इसलिए नवरात्र की शुभ पूजा से पहले कलश के रूप में गणेश को स्थापित किया जाता है। आइए जानते है कि नवरात्र में कलश कैसे स्थापना किया जाता है।

कलश स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण वस्तुएं:

· मिट्टी का पात्र और जौ
· शुद्ध साफ की हुई मिट्टी
· शुद्ध जल से भरा हुआ सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का कलश
· मोली (लाल सूत्र)
· साबुत सुपारी
· कलश में रखने के लिए सिक्के
· अशोक या आम के 5 पत्ते
· कलश को ढंकने के लिए मिट्टी का ढक्कन
· साबुत चावल
· एक पानी वाला नारियल

· लाल कपड़ा या चुनरी
· फूल से बनी हुई माला

नवरात्र कलश स्थापना की विधि:

नवरात्र में देवी पूजा के लिए जो कलश स्थापित किया जाता है वह सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का ही होना चाहिए। लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग पूजा में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

भविष्य पुराण के अनुसार कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को शुद्ध कर लेना चाहिए। एक लकड़ी का फट्टा रखकर उसपर लाल रंग का कपड़ा बिछाना चाहिए। इस कपड़े पर थोड़े चावल रखने चाहिए। चावल रखते हुए सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करना चाहिए। एक मिट्टी के पात्र (छोटा समतल गमला) में जौ बोना चाहिए। इस पात्र पर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करना चाहिए। कलश पर रोली से स्वस्तिक या ऊं बनाना चाहिए।
कलश के मुख पर रक्षा सूत्र बांधना चाहिए। कलश में सुपारी, सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रखने चाहिए। कलश के मुख को ढक्कन से ढंक देना चाहिए। ढक्कन पर चावल भर देना चाहिए। एक नारियल ले उस पर चुनरी लपेटकर रक्षा सूत्र से बांध देना चाहिए। इस नारियल को कलश के ढक्कन पर रखते हुए सभी देवताओं का आवाहन करना चाहिए। अंत में दीप जलाकर कलश की पूजा करनी चाहिए। कलश पर फूल और मिठाइयां चढ़ाना चाहिए।

गुरुवार, 23 मार्च 2017

एकता की ताकत 

एक किसान के चार बेटे थे जब वे छोटे थे तब से ही वे आपस में लड़ते थे किसान और उसकी पत्नी को अपने चारो बेटे के इस व्यव्हार के चलते वे बहुत दुखी रहते थे और वे हमेसा अपने बेटो को समझाते रहते थे की अगर आपस में लड़ते रहोगे तो निश्चित ही एक दिन ऐसा भी आएगा जब तुम लोगो को कोई न तो मदद ही करेगा और न ही तुम लोगो में आपस में एकता रहेगी तो कोई  भी हानि पंहुचा सकता है लेकिन किसान के बेटो को अपनी माँ बाप के सलाह का कोई उनपर प्रभाव पड़ता था

उल्टा होने ये अहसास होता की वे अकेले ही सबकुछ कर सकते है अगर उनकी कोई मदद भी नही करे तो वे सबकुछ अकेले ही कर सकते है

समय बीतता गया और किसान के चारो बेटे बड़े हो गये तो किसान को भी अब पहले के अपेक्षा अधिक शक्ति न रही तो वह अपने खेतो का काम अपने चारो बेटो पर सौप देना चाहां तो एक बार किसान के चारो बेटे आपस में लड़ने लगे

ये सब देखकर किसान ने अपने बेटो को खेतो का काम सौपना चाहा तो पहले तो वे एक एक साथ काम करने को तैयार नही हुए फिर जब किसान ने उनको अलग अलग काम देने की बात कही तो फिर तैयार हुए

इस प्रकार ने अपने बेटो को अलग अलग काम सौप दिए तो सबने अपना अपना काम जानकर अपने कामो में जुट गये तो बड़े बेटे ने अपने काम के अनुसार खेतो की जुताई कर दिया तो दुसरे बेटे ने खेतो में बीज फसल बो दिए तो तीसरे बेटे ने समय समय पर खाद पानी भी दे दिया तो अब अंत में सबसे छोटे बेटे की बारी थी उसका काम था पूरी फसल को काटना था और छोटे लड़के ने फसलो को कटवाकर खेतो में ही छोड़ दिया था की अगले दिन वह उसे घर में रखवा देंगा लेकिन अचानक बारिश की मौसम होने की वजह से मौसम बहुत ही ख़राब हो चुका था और बारिश कभी भी आ सकती थी तो छोटे लड़के ने अपने भाईयो से जाकर बोला की वे सब फसलो को घरो में रखने के लिए उसका मदद करे लेकिन उनके भाईयो ने एक न सुनी और बोले की ये तुम्हारा काम है इसलिए तुम ही अकेले निपटाओ

 तो किसान का छोटा लड़का निराश होकर वापस खेतो की तरफ लौट गया और जितना हो सका उतना फसल को घर में रखवाना शुरू किया की बहुत अधिक तेज से बारिश होने लगी और सारी सुखी हुई फसल भीग गयी और अत्यधिक बारिश की वजह से उसका कुछ फसल पानी में बह भी गया जो की अब पूरी तरह से ख़राब हो चुकी थी

इतना सबकुछ होने के बाद भी किसान के बाकी बेटो को अपने आगे किसी की न सूझती उन्हें लगता की वे ही अकेले सबकुछ कर सकते है इतना होने के बाद उनका अपना घमंड नही टुटा

फिर इसके बाद उनका किसी तरह से गुजारा चल रहा था की अचानक एक दिन जाड़े के मौसम में किसान के बड़े बेटे का तबियत बहुत ही ख़राब हो गयी उसे बहुत तेज बुखार था लेकिन गाव में कोई अच्छे डॉक्टर न होने से लोगो ने उसे उसी वक़्त शहर ले जाने की सलाह दिया

तो अब किसान के बाकी बेटे सोचने लगे की अपने भाई को कौन शहर ले जायेगा क्यू की वे सिर्फ अपने बारे में ही सब सोचते थे कोई किसी की परवाह न करता था तो अंत में किसान का सबसे छोटा बेटा अपने भाई के दवा के लिए शहर ले जाने को तैयार हो गया और तुरंत उसने कुछ पैसे और एक गाडी की व्यवस्था कर दिया और अपने अपने पिताजी के साथ शहर की और चल दिया और शहर में जाकर अच्छे से डोक्टर से अपने भाई का दवा करवाया जिससे उसकी भाई की तबियत ठीक हो गयी

तो इस पर डॉक्टर ने कहा की आप लोग अपने भाई को सही समय पर होसपिटल ले आये वरना इनकी हालत और भी ख़राब हो सकती थी और कुछ भी हो सकता था

ये सब बाते सुनकर किसान के सभी बेटो के आखो में आसु आ गये और सबने अपने छोटे भाई का बहुत बहुत ही धन्यवाद किया और उस दिन से किसान के सभी बेटो ने निर्णय लिया की वे सभी आपस में अब मिलजुल कर रहेगे सभी एक दुसरे के सुखदुख में हमेसा एक साथ रहेगे और कभी भी आपस में लड़ेगे नही, ये सब बाते सुनकर किसान की आखो में आसु आ गये और उसने अपने चारो बेटो को गले लगा लिया और फिर सब एक साथ मिलजुल कर रहने लगे

तो देखा दोस्तों किस प्रकार यदि किसान के बेटो में पहले से एकता रहती तो उनकी फसल कभी ख़राब नही होती लेकिन इन्सान जब बड़े होते है तो उन्हें लगता है वे अकेले ही सबकुछ कर सकते है जो की बिना अपनों के सहयोग के कोई कुछ भी नही पाता है

या दोस्तों हमे लगता है जब कुछ थोड़े बड़े होते है और अपने Decision खुद से लेने लगते है और कुछ पैसे कमाने लगते है तो हमे यह महसूस होता है की अकेले ही हम सबकुछ कर सकते है लेकिन दोस्तों हमे इस बात का भी हमेसा ध्यान रखना चाहिए हम अपने सुख में चाहे कितने अकेले हो रह सकते है लेकिन जब भी दुःख की घड़ी हमारे जीवन में आती है तो हमे अपने जरुर याद आते है तब हमे लगता है उनकी जरुरत बहुत है इसलिए दोस्तों हमे अपने सगे संबंधियों से हमेसा मिलजुल कर एक साथ रहना चाहिए पता नही कब किसकी जरूरत आन पड़े

इसलिए कहा भी गया जब हम अकेले होते है तो हमे कोई भी तोड़ सकता है या फिर हमे कमजोर कर सकता है यदि हम अपनों के साथ मिलजुल एक साथ रहे तो यही एकता की ताकत हमारी पहचान बन जाती है

इसलिए दोस्तों आप जहा भी रहे जैसे भी रहे लोगो के साथ मिलजुल कर प्रेमभाव से एकता से रहिये फिर कोई आपका कुछ नही बिगाड़ सकता है और फिर कितनी भी बड़ी मुसीबत क्यू न आ जाये हम मिल जुलकर आसानी से उसका सामना कर सकते है

बुधवार, 22 मार्च 2017

एक खुशहाल जीवन के लिए

आपकी खुशी आपके हाथ

अभी के अभी सभी काम छोड़कर खुद से एक बात कहें। जी हां, इसी पल अपने आप से एक बात कहें – ‘मेरी खुशी मेरे ही हाथ में है, और इसे मुझसे कोई नहीं छीन सकता’। अच्छा लगा? यदि आपने दिल से अपने आप से यह बात कही है तो आपके चेहरे पर एक मुस्कान जरूर होगी।

खुद से कहें ये बात

केवल इतना सा वाक्य आपके भीतर एक खुशी एवं उत्साह को भर देता है। और यह बात सत्य ही तो है, यदि हम अपने लिए खुशियां बटोर लें, केवल बड़ी नहीं कुछ छोटी-छोटी भी और साथ ही दूसरों की व्यर्थ बातों का खुद पर असर ना होने दें तो हम शायद ही कभी उदास रहें।

अमल करें इन्हें

लेकिन इंसानी दिमाग सब कुछ जानते हुए भी इन बातों को अपने जीवन में अमल नहीं कर पाता है। लेकिन मेरी मानिए तो चंद आदतों को अलविदा कहकर उसके स्थान पर कुछ अच्छे विचार लाकर आप अपनी पूरी ज़िंदगी को बदलकर रख सकते हैं।

बदलाव की जरूरत

स्थिति वही होगी, वही लोग होंगे आसपास, कोई बड़ा सामाजिक बदलाव नज़र नहीं आएगा। लेकिन फिर भी आप अपने भीतर एक बड़ा बदलाव पाएंगे। परन्तु यह तभी संभव है जब आप अपने आप को इस काबिल बनाएंगे।

खुद को खुश रखें

खुद को खुश रखने के लिए सबसे पहले आपको उन बातों से बचना होगा जो आपको दुखी करती हैं। सबसे पहले तो खुद से प्यार करें। दुनिया में कोई भी परफेक्ट नहीं होता, आप भी नहीं है, इस बात को स्वीकार लें। और कभी भी स्वयं की तुलना किसी से ना करें।

आज की जेनरेशन की दिक्कत

आज की जेनरेशन के लड़कों को गैजेट्स से बहुत प्यार है, इसलिए उन्हें यह आदत सी बन जाती है कि दूसरे व्यक्ति जैसा गैजेट उनके पास क्यों नहीं। दूसरी ओर लड़कियां भी अपनी तुलना में किसी दूसरी लड़की के कपड़े, वस्तुएं एवं सुंदरता देखकर परेशान हो जाती हैं।

तुलना मत करें

यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो सबसे पहले तुलना को बाय-बाय कहें और यदि आप वैसा कुछ पाना चाहते हैं तो केवल मेहनत करें परन्तु इसका खुद पर मानसिक असर ना होने दें। तुलना के अलावा किसी पर अंगुली उठाना भी बंद करें।

भूल स्वीकार करें

आपसे कोई भूल हो तो उसे समझें, उससे भागने के लिए किसी और को कसूरवार ना ठहराएं। हो सकता है कि गलती सच में किसी और से ही हुई हो, परन्तु यहां एक जिम्मेदार इंसान बनते हुए समस्या का हल खोजें ना कि बहस करके उसे और बढ़ाएं।

झूठी तसल्ली ना दें

तुलना के अलावा हम एक-दूसरे को झूठी तसल्ली भी देते हैं। कैसे? आजकल के कपल्स एक-दूसरे को इम्प्रेस करने में लगे रहते हैं। रिलेशन के शुरुआती दौर में केवल एक-दूजे के सामने अच्छी बातें रखना, बुरी बातों को छुपाना यह सब आम देखा गया है।

जब बातें खुलेंगी

लेकिन जब कुछ समय बाद बुरी बातें सामने आती हैं तो प्यार के साथ विश्वास भी फीका पड़ने लगता है। इसलिए याद रखें कि इम्प्रेशन जैसी बात कुछ ही समय के लिए होती है और फिर बाद में धुंआ बनकर उड़ जाती है।

अच्छा म्यूजिक सुनें

लेकिन हमारी आदतों के अलावा हमारे दिनभर के कुछ कार्य भी ऐसे हैं जिन्हें हमें कभी नहीं करना चाहिए। यदि आप म्यूजिक सुनना पसंद करते हैं या फिर रोजाना ट्रैवेल करते समय फोन में या गाड़ी में गाने लगाते हैं तो कुछ अच्छे यानी कि प्रोत्साहन देने वाले गाने सुनें।

सॉफ्ट म्यूजिक

गुस्सैल स्वभाव, लाउड म्यूजिक और सैड सॉन्ग्स सुनने की आदत कभी ना डालें। क्योंकि ऐसे गाने हमें उस एक पल के लिए काफी उदास कर देते हैं। और कई बार यह उदासी पूरा दिन चाहकर भी भुला पाना मुश्किल हो जाता है।

झगड़ों से बचें

झगड़े हमें परेशान करते हैं। किसी विद्वान ने सही तो कहा है कि गुस्सा स्वयं उसी का विनाश करता है जो इसका इस्तेमाल करता है। गुस्से से आज तक किसी का फायदा नहीं हुआ, यह किसी ना किसी रूप में नुकसानदेह ही रहा है। तो प्लीज... गुस्सा और झगड़ा इन दोनों से बच कर ही रहें।

आप हमेशा सही नहीं हो सकते

गुस्सा तब आता है जब इंसान के बीच ‘हमेशा मैं ही सही हूं’ वाली भावना आ जाती है। कभी-कभी मान लेना चाहिए कि हमसे भी गलतियां हो सकती हैं। तो फिर हमेशा परेशानियों के लिए किसी दूसरे को दोषी मान लेना सही भी तो नहीं है।

रिश्तों को समेटे

आजकल के टूटते रिश्तों का यही सबसे बड़ा कारण है। पती-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका या किसी भी अन्य रिश्ते में जब गलतियां ना मानने वाली भावना पनपने लगती है तो वहां दरार आ जाती है। फिर यही दरार धीरे-धीरे रिश्तों को खत्म करने का काम करती हैं।

हमारा स्वभाव

हमारे स्वभाव एवं आदतों से जुड़े यह पहलू हमें बताते हैं कि हम कितने गलत ट्रैक पर चल पड़े हैं। इससे भी बड़ी गलती हम रोज़ाना करते हैं जब हम सुबह उठने के बाद रात को सोने तक केवल रोजमर्रा के कार्य करते रहते हैं।

रोज़ाना के कार्य

समय से उठना, ऑफिस जाना, जीवन की गाड़ी चलाने के लिए आमदनी कमाना और रात को थक-हारकर घर लौटना। हम यह नहीं कह रहे कि ये गलत है।

जीने का तरीका

पर गलती तो हम तब करते हैं जब हम जीवन की सबसे बड़ी जरूरत को दिनभर नकारते रहते हैं। क्या है वो जरूरत? वो है हमारी खुशी। जीवन को सही रूप में जीने का तरीका।

दिल से खुशी पाएं

इसके लिए हमें दिनभर में एक या दो तो ऐसे काम करने ही चाहिए जो हमें दिल से खुशी दें। हमारे चेहरे पर रौनक लाए, तभी तो ज़िंदगी जीने का मन भी करेगा। इसके लिए सबसे पहले तो लालच को त्यागना जरूरी है।

लालच ना करें

लालच ने इंसान के स्वभाव को तार-तार कर दिया है। लालच के इस दलदल में इंसान डूबता जाता है और वह समझ नहीं पाता कि किसी दिन वो बस इसी में धंस कर रह जाएगा और कोई उसे निकालने के लिए भी नहीं आएगा।

लालच- आपका दुश्मन

यह लालच उस व्यक्ति के सामाजिक रिश्तों के साथ उसके जीवन को भी खत्म करता जाता है। तो जनाब.... पहले जीना सीख लें, पैसा तो सारी ज़िंदगी ही कमाना है।

ज्ञान की बातें...


ज्ञान की बातें.....
१. घर में कुछ देर भजन अवश्य लगाएं। 
२. घर में कभी भी झाड़ू को खड़ा करके नहीं रखें, उसे पैर न लगाएं, न ही उसके ऊपर से गुजरें अन्यथा घर में लाभ में कमी हो जाती है, झाड़ू हमेशा छुपाकर रखें। 
३. बिस्तर पर बैठकर भोजन न करें, इससे दुःस्वप्न आते हैं। 
४. घर में जूते चप्पल इधर-उधर बिखेरकर या उल्टे करके नहीं रखने चाहिए, इससे घर में अशांति उत्पन्न होती है। 
५. पूजा सुबह 6 से 8 बजे के बीच भूमि पर आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठकर करनी चाहिए। पूजा का आसन जूट अथवा कुश का हो तो उत्तम है।
६. पहली रोटी गाय के लिए निकालें। इससे देवता भी खुश होते हैं और पितरों को भी शांति मिलती है।
७. पूजा घर में सदैव जल का एक कलश भरकर रखें, जो जितना संभव हो, ईशान कोण के हिस्से में हो।
८. आरती, दीप, पूजा, अग्नि जैसे पवित्रता के प्रतीक साधनों को फूंक मारकर नहीं बुझाएं।
९. मंदिर में धूप, अगरबत्ती व हवनकुंड की सामग्री दक्षिण पूर्व में रखें अर्थात आग्नेय कोण में।
१०. घर के मुख्यद्वार पर दांयी तरफ स्वास्तिक बनाएं।
११. घर में कभी भी जाले न लगने दें अन्यथा भाग्य व कर्म पर जाले लगने लगते हैं और बाधा आती है।
१२. सप्ताह में एक बार अवश्य समुद्री नमक अथवा सेंधा नमक से घर में पोंछा लगाएं। इससे नकारात्मक ऊर्जा हटती है।
१३. कोशिश करें कि सुबह के प्रकाश की किरणें सबसे पहले आपके पूजाघर तक जरूर पहुंचे।

१४. पूजाघर में अगर कोई प्रतिष्ठित मूर्ति है तो उसकी पूजा हर रोज निश्चित रूप से हो, ऐसी व्यवस्था करें।

90 प्रतिशत रोग केवल पेट से होते हैं। पेट में कब्ज
नहीं रहना चाहिए।

अन्यथा रोगों की कभी कमी नहीं रहेंगे ।
- 103 रोग भोजन के बाद जल पीने से होते हैं। भोजन के 1
घंटे बाद ही जल पीना चाहिये।
- 80 रोग चाय पीने से होते हैं ।
- ठंडेजल (फ्रिज)और आइसक्रीम से बड़ीआंत सिकुड़ जाती है।
- भोजन के पश्चात् स्नान करने से पाचनशक्ति मन्द
हो जाती है और शरीर कमजोर हो जाता है।
- शैम्पू, कंडीशनर और विभिन्न प्रकार के तेलों से बाल
पकने, झड़ने और दोमुहें होने लगते हैं।
- गर्म जल से स्नान से शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कम
हो जाती है और
शरीर कमजोर हो जाता है। गर्म जल सिर पर डालने से
आँखें कमजोर हो जाती हैं।
- खड़े होकर जल पीने से घुटनों(जोड़ों) में पीड़ा होती है।
- खड़े होकर मूत्रत्याग करने से रीढ़
की हड्डी को हानि होती है।
- भोजन पकाने के बाद उसमें नमक डालने से रक्तचाप
(ब्लडप्रेशर) बढ़ता है।
- जोर लगाकर छींकने से कानों को क्षति पहुँचती है।
- मुँह से साँस लेने पर आयु कम होती है।

- पुस्तक पर अधिक झुकने से फेफड़े खराब हो जाते हैं और क्षय
(टीबी) होने का डर रहता है।
- चैत्र माह में नीम के पत्ते खाने से रक्त शुद्ध हो जाता है
मलेरिया नहीं होता है।
- तुलसी के सेवन से मलेरिया नहीं होता है।
- हृदयरोगी के लिए अर्जुनकी छाल, लौकी का रस, तुलसी,
पुदीना, मौसमी,
सेंधा नमक, गुड़, चोकरयुक्त आटा, छिलकेयुक्त अनाज
औशधियां हैं।
- भोजन के पश्चात् गुड़ या सौंफ खाने से पाचन
अच्छा होता है। अपच नहीं होता है।
- मुलहठी चूसने से कफ बाहर आता है और आवाज मधुर
होती है।
- जल सदैव ताजा(चापाकल, कुएं
आदि का) पीना चाहिये, बोतलबंद (फ्रिज)
पानी बासी और अनेक रोगों के कारण होते हैं।
- नीबू गंदे पानी के रोग (यकृत, टाइफाइड, दस्त, पेट के
रोग) तथा हैजा से बचाता है।
- फल, मीठा और घी या तेल से बने पदार्थ खाकर तुरन्त जल
नहीं पीना चाहिए।
- भोजन पकने के 48 मिनट के अन्दर खा लेना चाहिए। उसके
पश्चात्
उसकी पोशकता कम होने लगती है। 12 घण्टे के बाद पशुओं
के खाने लायक भी नहीं रहता है।। - मिट्टी के बर्तन में
भोजन पकाने से पोशकता 100% कांसे के बर्तन में 97%
पीतल के बर्तन में 93% अल्युमिनियम के बर्तन और प्रेशर
कुकर में 7-13% ही बचते हैं।
- गेहूँ का आटा 15 दिनों पुराना और चना, ज्वार, बाजरा,
मक्का का आटा 7 दिनों से अधिक पुराना नहीं प्रयोग
करना चाहिए।
- खाने के लिए सेंधा नमक सर्वश्रेश्ठ होता है उसके बाद
काला नमक का स्थान आता है। सफेद नमक जहर के समान
होता है।
- सरसों, तिल,मूंगफली या नारियल का तेल
ही खाना चाहिए। देशी घी ही खाना चाहिए । रिफाइंड
तेल और वनस्पति घी (डालडा) जहर होता है।
- पैर के अंगूठे के नाखूनों को सरसों तेल से भिगोने से
आँखों की खुजली लाली और जलन ठीक हो जाती है।
- खाने का चूना 70 रोगों को ठीक करता है।
- चोट, सूजन, दर्द, घाव, फोड़ा होने पर उस पर 5-20
मिनट तक चुम्बक रखने से जल्दी ठीक होता है।
- मीठे में मिश्री, गुड़, शहद, देशी(कच्ची)
चीनी का प्रयोग करना चाहिए सफेद चीनी जहर
होता है।
-बर्तन मिटटी के ही परयोग करन चाहिए।
- टूथपेस्ट और ब्रश के स्थान पर
दातून और मंजन करना चाहिए दाँत मजबूत रहेंगे।
(आँखों के रोग में दातून नहीं करना)

बुराई में भी कुछ तो अच्‍छाई होती ही है।

बुराई में भी कुछ तो अच्‍छाई होती ही है।

 एक समय महात्‍मा बुद्ध को शहर के एक व्‍यापारी ने अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया।

महात्‍मा बुद्ध जब उस व्‍यपारी के घर पहुँचे, तो उस व्‍यापारी के पड़ौस में रहने वाले बहुत से लोग महात्‍मा बुद्ध से भेंट करने के लिए आए। उन लोगो के बीच में ही एक चोर भी आ गया आैर महात्‍मा बुद्ध को देखते ही पूछा, “स्‍वामी जी… क्‍या मैं आपके पैर धो सकता हूँ?

महात्‍मा बुद्ध अनुमति देते, उससे पहले ही वह उनके के पैर धोने लगा।

उस चोर के चर्चे नगर में बहुत ही प्रसिद्ध थे। नगरवासी उस चोर को पापी-दुष्‍ट कहते थे। जब वह चोर महात्‍मा बुद्ध के चरन धो रहा था, तो वहाँ आए लोगो ने मन ही मन सोचा कि महात्‍मा बुद्ध उस चोर को अभी दूर हटने को कह देंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और वह चोर महात्‍मा बुद्ध के पैर धोकर वहाँ से चुपचाप चला गया।

व्‍यापारी ने महात्‍मा बुद्ध से पूछा, “स्‍वामी जी… आप जानते है कि वह व्‍यक्ति कौन था?

महात्‍मा बुद्ध ने कहा, “नही..नहीं, मैं नहीं जानता कि वह व्‍यक्ति कौन था? लेकिन जो भी था उसमें श्रद्धा बहुत थी।

व्‍यापारी कहने लगा, “वह व्‍यक्ति एक चोर था। उस व्‍यक्ति से नगर के सभी लोग घृणा करते हैं और मैं भी, क्‍योकिं वह इस नगर का बदनाम चोर है। वह लोगों के ईमानदारी से कमाए हुए धन को चुराकर ले जाता है।

महात्‍मा बुद्ध ने वहाँ आए सभी लोगो और उस व्‍यापारी से एक सवाल किया।

महात्‍मा बुद्ध ने पूछा, “एक साहूकार से तुमने 100 रू और तुम्‍हारे मित्र ने 50 रू कर्ज लिया, लेकिन साहूकार ने तुम दोनो का कर्ज माफ कर दिया, क्‍योंकि तुम दोनों ही साहूकार का कर्ज चुका सकने में असमर्थ हो। यह देख वहाँ खड़ा तीसरा व्‍यक्ति दोनों में से किसे अच्‍छा कहेगा, साहूकार को या उन कर्जदारो को जिन्‍होने साहूकार से कर्ज लिया था?

व्‍यापारी ने कहा, “स्‍वामी जी, निश्चित तौर पर वह साहूकार ही अच्‍छा व्‍यक्ति है, जिसने दोनों का कर्जा माफ कर दिया।

महात्‍मा बुद्ध ने कहा, “जैसे आपने उस साहूकार को अच्‍छा कहा है ठीक उसी प्रकार लोग भी उसी व्‍यक्ति को अच्‍छा कहते हैं जो अच्‍छा करता है।

महात्‍मा बुद्ध ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “अगर आप सभी लोग उस चोर से घृणा करने की बजाए उसे सही राह दिखाने में सहायता करते, तो शायद आज वह भी आपकी ही तरह एक सभ्‍य पुरूष बन सकता था, लेकिन आप सभी को केवल उस व्‍यक्ति की बुराई नजर आई, आप में से किसी ने भी कभी भी उसको सही राह दिखाने की कोशिश नहीं की। अगर आप सभी लोग मिलकर अपनी ही तरह उसे भी कामकाज करना सि‍खाते, तो शायद आप लोगों की वजह से उसका जीवन भी बदल सकता था।”

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी के अवगुणों की वजह से हमें उससे घृणा नही करनी चाहिए, बल्कि कोई ऐसा रास्‍ता निकालना चाहिए जिससे किसी अवगुणी को सही मार्ग मिल सके और वह भी गुणवान बन सके।

व्‍यर्थ की चिन्‍ता, दु:ख का कारण।

व्‍यर्थ की चिन्‍ता, दु:ख का कारण।

एक शहर में एक अमीर व्‍यापारी रहता था। पूरे दिन बहुत मेहनत से काम करता था। एक दिन उसने अपने घर के सामने एक भिखारी को देखा तो थोड़ा चिंतित हो गया। व्‍यापारी मन ही मन में सोचने लगा कि अगर इस भिखारी के पास बहुत सारा धन होता, तो यह भीख नही मांगता। फिर व्‍यापारी के मन में खयाल आया कि कल को मेरे पास भी धन की कमी हो गई, तो मेरी भी भीख मांगने की नौबत आ जाएगी।

यही सोंच कर व्‍यापारी ने अपने मुनीम जी को बुलाया और कहा, “मुनीम जी…. पता कीजिए कि मेरे पास कितनी सम्पति है और कब तक के लिए पर्याप्त है?

कुछ दिनों बाद मुनीम जी व्‍यापारी का बही खाता लेकर आए और व्‍यापारी से कहा, “सेठजी… जिस तरह से आप अपना धन जमा करते है, उस हिसाब से आपकी छ: पीढ़ीयां आराम से खा-पी सकती है।

वह व्‍यापारी चौंका और कहा, “बस… छ: पीढ़ी ही खा-पी सकती है, तो सांतवी पीढ़ी का क्या होगा?

व्‍यापारी इसी बात को सोच कर बहुत बीमार हो गया। बीमारी की खबर सुन कर एक दिन उस व्‍यापारी से उसका एक मित्र मिलने आया और उसकी बीमारी का कारण पूछते हुए कहा, “क्‍यों मित्र… तुम इतने हष्‍ट-पुष्‍ट हो फिर कैसे बीमार हो गए?

व्‍यापारी ने अपने मित्र से कहा, “मित्र… मेरे पास बस इतना ही धन है कि मेरी छ: पीढ़ीया खा-पी सके और मैं चिंतित हूं कि सांतवी पीढ़ी का क्‍या होगा? मैने इतनी मेहनत की लेकिन कुछ लाभ नहीं हुआ। मेरी सांतवी पीढ़ी भूखी ही मर जाएगी। 

व्‍यापारी के मित्र ने मुस्‍कुराते हुए कहा, “तुम्‍हारी सांतवी पीढ़ी के भोजन की व्‍यवस्‍था तो मैं नहीं कर सकता, लेकिन तुम स्‍वस्‍थ हो जाओ, इसका एक बहुत ही अच्‍छा उपाय है मेरे पास।

व्यापारी ने बड़ी ही उत्‍सुकता से अपने मित्र की आेर देखते हुए पूछा, “क्‍या… क्‍या उपाय है? बोलो… जल्‍दी बोलो।

मित्र ने कहा, “तुम किसी एक भिखारी को  हर रोज सुबह-सुबह ही भोजन करवा दो, तो तुम्‍हारी बीमारी जल्‍दी ही दूर हो जाएगी।

वह व्‍यापारी सुबह होते ही भिखारी की खोज करने लगा, लेकिन व्‍यापारी को कोई भिखारी नजर नहीं आया। निराश होकर व्‍यापारी घर की तरफ बढ़ा ही था कि व्‍यापारी को वही भिखारी नजर आया जिसको उसने एक दिन भीख मांगते देखा था।

व्‍यापारी ने उस भिखारी को देख कर कहा, “हे भाई… मैं तुम्‍हारे लिए भोजन लाया हूँ। लो तुम खालो इसे।

भिखारी ने कहा, “नहीं सेठ जी… मैं आपका भोजन नहीं ले सकता हूँ।

व्‍यापारी ने पूछा, “क्‍यों…. क्‍यो नहीं ले सकते हो मेरा दिया भोजन।

भिखारी ने कहा, “सेठ जी… मेरा आज का भोजन हो गया और अब मैं घर जा रहा हूँ।

व्‍यापारी ने कहा, “तो कोई बात नहीं, कल मैं तुम्‍हारे लिए भोजन ले आउ़ंगा, तुम कल भोजन कर लेना।

इस पर वह भिखारी बोला, “सेठ जी… जब आज का भोजन भगवान ने दे दिया तो कल भी भगवान ही दे देगा। इसमे मैं चिंता क्‍यों करू। मैं कल का सोंच कर बेवजह ही क्‍यों परेशान रहूँ।

उस भिखारी की बातों ने व्‍यापारी जैसे नींद से जगा दिया हो। वह सुन्‍न सा खड़ा सोंचता रहा कि, “कैसा भिखारी है? इसके पास कुछ भी नहीं है, फिर भी इसे आने वाले भविष्‍य की कोई चिंता नहीं है और एक मैं हूँ, जो सांतवी पीढ़ी सुखी रहे, इस बात को सोंचकर बीमार हो गया, जबकि उस सांतवी पीढ़ी को मैं देखूंगा भी नहीं।

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कहीं आप भी ऐसी ही किसी चिन्‍ता का शिकार तो नहीं हैं, जो आपको बेवजह परेशान और बीमार किए हुए है क्‍योंकि अक्‍सर हम सभी इसी तरह की किसी बेवजह की समस्‍या से परेशान होते हैं, जो कि वास्‍तव में कोई समस्‍या ही नहीं होती।

सोमवार, 20 मार्च 2017

 शिव कथा तपस्या का फल

भगवान शंकर को पति के रूप में पाने हेतु माता-पार्वती कठोर तपस्या कर रही थी। उनकी तपस्या पूर्णता की ओर थी। एक समय वह भगवान के चिंतन में ध्यान मग्न बैठी थी। उसी समय उन्हें एक बालक के डुबने की चीख सुनाई दी। माता तुरंत उठकर वहां पहुंची। उन्होंने देखा एक मगरमच्छ बालक को पानी के भीतर खींच रहा है। 

बालक अपनी जान बचाने के लिए प्रयास कर रहा है, तथा मगरमच्छ उसे आहार बनाने का। करुणामयी मां को बालक पर दया आ गई। उन्होंने मगरमच्छ से निवेदन किया कि बालक को छोड़ दीजिए इसे आहार न बनाएं। मगरमच्छ बोला माता यह मेरा आहार है मुझे हर छठे दिन उदर पूर्ति हेतु जो पहले मिलता है, उसे मेरा आहार ब्रह्मा ने निश्चित किया है। माता ने फिर कहा आप इसे छोड़ दे इसके बदले मैं अपनी तपस्या का फल दुंगी। ग्राह ने कहा ठीक है। माता ने उसी समय संकल्प कर अपनी पूरी तपस्या का पुण्य फल उस ग्राह को दे दिया। 
ग्राह तपस्या के फल को प्राप्त कर सूर्य की भांति चमक उठा। उसकी बुद्धि भी शुद्ध हो गई। उसने कहां माता आप अपना पुण्य वापस ले लें। मैं इस बालक को यू हीं छोड़ दुंगा। माता ने मना कर दिया तथा बालक को गोद में लेकर ममतामयी माता दुलारने लगी। बालक को सुरक्षित लौटाकर, माता ने अपने स्थान पर वापस आकर तप शुरु कर दिया। 
भगवान शिव तुरंत ही वहां प्रकट हो गए, और बोले पार्वती अब तुम्हें तप करने की आवश्यकता नहीं है। हर प्राणी में मेरा ही वास है, तुमने उस ग्राह को तप का फल दिया वह मुझे ही प्राप्त हुआ। अत: तुम्हारा तप फल अनंत गुना हो गया। तुमने करुणावश द्रवित होकर किसी प्राणी की रक्षा की अत: मैं तुम पर प्रसन्न हूं तथा तुम्हें पत्नी रूप में स्वीकार करता हूं। 

कथा का सारंश यही है कि जो परहित की कामना करता है। उस पर परमात्मा की असीम कृपा होती है। जो व्यक्ति असहायों की सहायता, दयालु प्रेमी करुणाकारी होता है। ईश्वर उसको स्वीकार करते हैं। यह कथा शिवपुराण में उल्लेखित है।

जय महादेव

शिव कथा कैसी लगी

संगठन की शक्ति

 एक वन में बहुत बडा अजगर रहता था। वह बहुत अभिमानी और अत्यंत क्रूर था। जब वह अपने बिल से निकलता तो सब जीव उससे डरकर भाग खडे होते। उसका मुंह इतनाविकराल था कि खरगोश तक को निगल जाता था। एक बार अजगर शिकार की तलाश में घूम रहा था। सारे जीव तो उसे बिल से निकलते देखकर ही भाग चुके थे। उसे कुछ न मिला तो वह क्रोधित होकर फुफकारने लगा और इधर-उधर खाक छानने लगा। वहीं निकट में एक हिरणी अपने नवजात शिशु को पत्तियों के ढेर के नीचे छिपाकर स्वयं भोजन की तलाश में दूर निकल गई थी।

अजगर की फुफकार से सूखी पत्तियां उडने लगी और हिरणी का बच्चा नजर आने लगा। अजगर की नजर उस पर पडी हिरणी का बच्चा उस भयानक जीव को देखकर इतना डर गया कि उसके मुंह से चीख तक न निकल पाई। अजगर ने देखते-ही-देखते नवजात हिरण के बच्चे को निगल लिया। तब तक हिरणी भी लौट आई थी, पर वह क्या करती? आंखों में आंसू भर जड होकर दूर से अपने बच्चे को काल का ग्रास बनते देखती रही। 

हिरणी के शोक का ठिकाना न रहा। उसने किसी-न किसी तरह अजगर से बदला लेने की ठान ली। हिरणी की एक नेवले से दोस्ती ती। शोक में डूबी हिरणी अपने मित्र नेवले के पास गईऔर रो-रोकर उसे अपनी दुखभरी कथा सुनाई। नेवले को भी बहुत दुख हुआ। वह दुख-भरे स्वर में बोला “मित्र,

मेरे बस में होता तो मैं उअस नीच अजगर के सौ टुकडे कर डालता। पर क्या करें, वह छोटा-मोटा सांप नहीं हैं,जिसे मैं मार सकूं वह तो एक अजगर हैं। अपनी पूंछ की फटकार से ही मुझे अधमरा कर देगा। लेकिन यहां पास में ही चीटिंयों की एक बांबी हैं। वहां की रानी मेरी मित्र हैं। उससे सहायता मांगनी चाहिए। 

हिरणी निराश स्वर में विलाप किया “पर जब तुम्हारे जितना बडा जीव उस अजगर का कुछ बिगाडने में समर्थ नहीं हैं तो वह छोटी-सी चींटी क्या कर लेगी?” नेवले ने कहा “ऐसा मत सोचो। उसके पास चींटियों की बहुत बडी सेना हैं। संगठन में बडी शक्ति होती हैं।

हिरणी को कुछ आशा की किरण नजर आई। नेवला हिरणी को लेकर चींटी रानी के पास गया और उसे सारी कहानी सुनाई। चींटी रानी ने सोच-विचारकर कहा “हम तुम्हारी सहायता करेंगे । हमारी बांबी के पास एक संकरीला नुकीले पत्थरों भरा रास्ता हैं। तुम किसी तरह उस अजगर को उस रास्ते से आने पर मजबूर करो। बाकी काम मेरी सेना पर छोड दो।”

नेवले को अपनी मित्र चींटी रानी पर पूरा विश्वास था इसलिए वह अपनी जान जोखिम में डालने पर तैयार हो गया। दूसरे दिन नेवला जाकरसांप के बिल के पास अपनी बोली बोलने लगा। अपने शत्रु की बोली सुनते ही अजगर क्रोध में भरकर अपने बिल से बाहर आया। नेवला उसी संकरे रास्ते वाली दिशा में दौडा। अजगर ने पीछा किया।

अजगर रुकता तो नेवला मुडकर फुफकारता और अजगर को गुस्सा दिलाकर फिर पीछा करने पर मजबूर करता। इसी प्रकार नेवले ने उसे संकरीले रास्ते से गुजरने पर मजबूर कर दिया। नुकीले पत्थरों से उसका शरीर छीलने लगा। जब तक अजगर उस रास्ते से बाहर आया तब तक उसका काफी शरीर छिल गया था और जगह-जगह से खून टपक रहा था।

उसी समय चींटियों की सेना ने उस पर हमला कर दिया। चींटियां उसके शरीर पर चढकर छिले स्थानों के नंगे मांस को काटने लगीं। अजगर तडप उठा। अपना शरीर पटकने लगा जिससे और मांस छिलने लगा और चींटियों को आक्रमण के लिए नए-नए स्थान मिलने लगे। अजगर चींटियों का क्या बिगाडता? वे हजारों की गिनती में उस पर टूट पड रही थी। कुछ ही देर में क्रूर अजगर ने तडप-तडपकर दम तोड दिया।


शनिवार, 18 मार्च 2017

शीतला माता को प्रसन्न करने का उपाय, कथा व आरती

शीतला माता की कथा-

एक गांव में एक स्त्री रहती थी, जो शीतलाष्टमी (बासोड़ा) की पूजा करती और ठंडा भोजन लेती थी। एक बार गांव में आग लग गई। उसका घर छोड़कर बाकी सबके घर जल गए। गांव के सब लोगों ने उससे इस चमत्कार का रहस्य पूछा। उसने कहा कि मैं बासोड़ा के दिन ठंडा भोजन लेती हूं और शीतला माता का पूजन करती हूं। आप लोग यह कार्य तो करते नहीं हैं। इससे मेरा घर नहीं जला और आप सबके घर जल गए। तब से बासोड़ा के दिन सारे गांव में शीतला माता का पूजन आरंभ हो गया। 

माना जाता है कि शीतला माता भगवती दुर्गा का ही रूप हैं। चैत्र महीने में जब गर्मी प्रारंभ हो जाती है, तो शरीर में अनेक प्रकार के पित्त विकार भी होने लगते हैं। शीतलाष्टमी का व्रत करने से व्यक्ति के पीत ज्वर, फोड़े, आंखों के सारे रोग, चिकनपॉक्स के निशान व शीतला जनित सारे दोष ठीक हो जाते हैं। इस दिन सुबह स्नान करके शीतला देवी की पूजा की जाती है।  

इसके बाद एक दिन पहले तैयार किए गए ठंडे खाने का भोग लगाया जाता है। इस व्रत को रखने से शीतला देवी खुश होती हैं। एक दिन ठंडा खाना खाया जाता।

शीतला माताजी का पुराना मंदिर हमारे गांव मनोरा में भी है यहां पर हर साल मेला लगता । आस पास के गांव के लोग आते हैं माताजी के दर्शन करते हैं

 शीतला माता की आरती-

जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता,

आदि ज्योति महारानी सब फल की दाता। जय शीतला माता... 

रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भ्राता,

ऋद्धि-सिद्धि चंवर ढुलावें, जगमग छवि छाता। जय शीतला माता... 

विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता,

वेद पुराण बरणत पार नहीं पाता । जय शीतला माता... 

इन्द्र मृदंग बजावत चन्द्र वीणा हाथा,

सूरज ताल बजाते नारद मुनि गाता। जय शीतला माता... 

घंटा शंख शहनाई बाजै मन भाता,

करै भक्त जन आरति लखि लखि हरहाता। जय शीतला माता...

ब्रह्म रूप वरदानी तुही तीन काल ज्ञाता,

 भक्तन को सुख देनौ मातु पिता भ्राता। जय शीतला माता... 

जो भी ध्यान लगावें प्रेम भक्ति लाता,

सकल मनोरथ पावे भवनिधि तर जाता। जय शीतला माता... 

रोगन से जो पीड़ित कोई शरण तेरी आता,

कोढ़ी पावे निर्मल काया अन्ध नेत्र पाता। जय शीतला माता... 

बांझ पुत्र को पावे दारिद कट जाता,

ताको भजै जो नाहीं सिर धुनि पछिताता। जय शीतला माता... 

शीतल करती जननी तू ही है जग त्राता,

उत्पत्ति व्याधि विनाशत तू सब की घाता। जय शीतला माता... 

दास विचित्र कर जोड़े सुन मेरी माता,

भक्ति आपनी दीजे और न कुछ भाता।

जय शीतला माता... 

शीतलाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं
जय महादेव

तीन मछलियां

तीन मछलियां

तीन मछलियां

एक सरोवर मेँ तीन दिव्य मछलियाँ रहती थीँ। वहाँ की तमाम मछलियाँ उन तीनोँ के प्रति ही श्रध्दा मेँ बँटी हुई थीँ।

एक मछली का नाम व्यावहारिकबुद्धि था, दुसरी का नाम मध्यमबुद्धि और तीसरी का नाम अतिबुद्धि था।

अतिबुद्धि के पास ज्ञान का असीम भंडार था। वह सभी प्रकार के शास्त्रोँ का ज्ञान रखती थी। मध्यमबुद्धि को उतनी ही दुर तक सोचनेँ की आदत थी, जिससे उसका वास्ता पड़ता था। वह सोचती कम थी, परंपरागत ढंग से अपना काम किया करती थी।व्यवहारिक बुद्धि न परंपरा पर ध्यान देती थी और न ही शास्त्र पर। उसे जब जैसी आवश्यकता होती थी निर्णय लिया करती थी और आवश्यकता न पड़नेँ पर किसी शास्त्र के पन्ने तक नहीँ उलटती थी।

एक दिन कुछ मछुआरे सरोवर के तट पर आये और मछलियोँ की बहुतायत देखकर बातेँ करनेँ लगे कि यहाँ काफी मछलियाँ हैँ, सुबह आकर हम इसमेँ जाल डालेँगे।

उनकी बातेँ मछलियोँ नेँ सुनीँ।

व्यवहारिक बुद्धि नेँ कहा-” हमेँ फौरन यह तालाब छोड़ देना चाहिए। पतले सोतोँ का मार्ग पकड़कर उधर जंगली घास से ढके हुए जंगली सरोवर मेँ चले जाना चाहिये

मध्यमबुद्धि नेँ कहा- ” प्राचीन काल से हमारे पूर्वज ठण्ड के दिनोँ मेँ ही वहाँ जाते हैँ और अभी तो वो मौसम ही नहीँ आया है, हम हमारे वर्षोँ से चली आ रही इस परंपरा को नहीँ तोड़ सकते। मछुआरोँ का खतरा हो या न हो, हमेँ इस परंपरा का ध्यान रखना है।”

अतिबुद्धि नेँ गर्व से हँसते हुए कहा-” तुम लोग अज्ञानी हो, तुम्हेँ शास्त्रोँ का ज्ञान नहीँ है। जो बादल गरजते हैँ वे बरसते नहीँ हैँ। फिर हम लोग एक हजार तरीकोँ से तैरना जानते हैँ, पानी के तल मेँ जाकर बैठनेँ की सामर्थ्यता है, हमारे पूंछ मेँ इतनी शक्ति है कि हम जालोँ को फाड़ सकती हैँ। वैसे भी कहा गया है कि सँकटोँ से घिरे हुए हो तो भी अपनेँ घर को
छोड़कर परदेश चले जाना अच्छी बात नहीँ है। अव्वल तो वे मछुआरे आयेँगे नहीँ, आयेँगे तो हम तैरकर नीचे बैठ जायेँगी उनके जाल मेँ आयेँगे ही नहीँ, एक दो फँस भी गईँ तो पुँछ से जाल फाड़कर निकल जायेंगे। भाई! शास्त्रोँ और
ज्ञानियोँ के वचनोँ के विरूध्द मैँ तो नहीँ जाऊँगी।”

व्यवहारिकबुद्धि नेँ कहा-” मैँ शास्त्रोँ के बारे मेँ नहीँ जानती , मगर मेरी बुद्धि कहती है कि मनुष्य जैसे ताकतवर और भयानक शत्रु की आशंका सिर पर हो, तो भागकर कहीँ छुप जाओ।” ऐसा कहते हुए वह अपनेँ अनुयायिओं को लेकर चल पड़ी।

मध्यमबुद्धि और अतिबुद्धि अपनेँ परँपरा और शास्त्र ज्ञान को लेकर वहीँ रूक गयीं । अगले दिन मछुआरोँ नेँ पुरी तैयारी के साथ आकर वहाँ जाल डाला और उन दोनोँ की एक न चली। जब मछुआरे उनके विशाल शरीर को टांग रहे थे तब
व्यवहारिकबुद्धि नेँ गहरी साँस लेकर कहा-” इनके शास्त्र ज्ञान नेँ ही धोखा दिया। काश! इनमेँ थोड़ी व्यवहारिक बुद्धि भी होती।”

व्यवहारिक बुद्धि से हमारा आशय है कि किस समय हमेँ क्या करना चाहिए और जो हम कर रहे हैँ उस कार्य का परिणाम निकलनेँ पर क्या समस्यायेँ आ सकती हैँ, यह सोचना ही व्यवहारिक बुद्धि है।

कबीर दास जी के दोहे

 बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ : जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है.

 पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ : बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके. कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा.

 साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

अर्थ : इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है. जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे.

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ : कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है. यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ : मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है. अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु  आने पर ही लगेगा !

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ : कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती. कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या  फेरो.

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ : सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए. तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का.

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

अर्थ : यह मनुष्य का स्वभाव है कि जब वह  दूसरों के दोष देख कर हंसता है, तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है न अंत.

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ : जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते  हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है. लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते.

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

अर्थ : यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है.

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ : न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है. जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है.

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

अर्थ : जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है.

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

अर्थ : इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है. यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता  झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं
लगता.

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर.

अर्थ : इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो !

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी  मुए, मरम न कोउ जाना।

अर्थ : कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है. इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन.                                                                                             कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन.

अर्थ : कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया. कबीर कहते हैं कि अब भी यह मन होश में नहीं आता. आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है. 

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई.                                                                                                          बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई.

अर्थ :कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए. बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है. इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई.                                                                                             जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो  गुण की कीमत होती है. पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है.

कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस.                                                                                                     ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस. 

अर्थ : कबीर कहते हैं कि हे मानव ! तू क्या गर्व करता है? काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है. मालूम नहीं, वह घर या परदेश में, कहाँ पर तुझे मार डाले.

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात.                                                                                                एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात.

अर्थ : कबीर का कथन है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है।जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी.

हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास.                                                                                               सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास.

अर्थ : यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं. सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है. —

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं।                                                                                              जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।

अर्थ : इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा. जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा.

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद.                                                                                                 खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि अरे जीव ! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है.

ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस.                                                                                                        भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस.

अर्थ : कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न  मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता.  —

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत                                                                                                     चन्दन भुवंगा बैठिया,  तऊ सीतलता न तजंत।

अर्थ : सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता. चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता.

 कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ.                                                                                           जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ.

अर्थ :कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है.

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई.                                                                                          सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ.

अर्थ : शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं.

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय.                                                                                                        सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय.

अर्थ : कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए. सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा.

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माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर.                                                                                       आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर .

अर्थ : कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन. शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं.

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मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई.                                                                                                पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई.

अर्थ : मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा.